सन २०१२ समाप्त होने जा रहा है। यह साल भी और सालों की तरह बीत जायेगा और हम एक नए साल में प्रवेश कर जायेंगे। बीता साल उपलब्धियों भरा रहा, किसी ने अन्तरिक्ष से छलांग लगाई, तो कहीं God Particle की खोज हुई, खेलों में भी कई नए रिकॉर्ड बने और तोड़े गए, तक़रीबन हर छेत्र में प्रगति हुई। फिर भी कहीं मन में यह लगता है की बीता साल शायद अच्छा कम और बुरा ज्यादा था। दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाएं, असंतोष, अशांति बनी रही। समाज में नैतिक पतन साफ़ दिखाई दे रहा है। पिछले दिनों दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की राजधानी में हुई एक ह्रदय विदारक घटना ने मानवता को तार तार कर दिया। शायद यह घटना पुरे साल में सबसे ज्यादा भयानक और विभत्स थी। अब वह लड़की हमारे बीच नहीं हैं, उसकी आँखें बंद हो चुकी हैं पर अब शायद हम सब की आँखें खुल जाएँ उसकी मृत्यु ने कई सवाल खड़े कर दिए जिसका जब सिर्फ सरकार को नहीं हम सब तो देना होगा। ऐसा नहीं है ऐसी घटनाएँ इसके पहले या बाद में नहीं हुई, और आगे नहीं होंगी इसका कोई कारण नज़र नहीं आ रहा है। और यह सब उस देश में जहाँ हम देविओं को पूजतें हैं, जहाँ सोनिया गाँधी, मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता, सुषमा स्वराज, शीला दिक्षित आदि जैसी हस्तियाँ हैं। हमारे चुने हुए प्रतिनिधिओं को इस देश के असल मुद्दों से कोई सरोकार नहीं है, उनके बेतुके बयां आप रोज ही मीडिया के जरिये सुनते हैं। हर साल संसद के बहिस्कार के रिकॉर्ड टूट रहें हैं। कुछ काम नहीं हो रहा है सिर्फ शोर ही हो रहा है, हम उन लोगों के कैसे भरोसा कर लें और कैसे देश को उनके भरोसे छोड़ दें।
माया कैलेंडर के अनुसार २१ दिसम्बर २०१२ तो दुनिया का विनाश होना था, शायद वो सही थे, मानव जाती का विनाश तो नहीं हुआ पर मानवता का विनाश हो गया, मानव सभ्यता का विनाश नहीं हुआ पर मानव में सभ्यता का विनाश हो गया। आज यही गिरे हुए सामाजिक व्ययवस्था के कारण यह सब हो रहा है। यह सब हमारी और हमारे द्वारा बनाये गए इस समाज की ही देन है। आज वह लोग कहाँ हैं जो भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर न्यू इयर, वैलेंटाइन्स डे, आदि का विरोध करते रहें हैं, उनको पहले आपने समाज में फैले बिमारी को दूर करना होगा। पच्छिमी देशों में तो ऐसे विभत्स कांड नहीं होते हैं महिलाओं के साथ या होते भी हैं तो यहाँ की तरह हजारों की संख्या में नहीं होते हैं। आंकड़ों पे नज़र डालें तो तो अकेले डेल्ही में है २०११ में ५७२ केस दर्ज हुए थे और २०१२ में अभी तक ६५० से ज्यादा केस दर्ज हो चुके हैं। जो की बाकि सभी बड़े शहर जिनकी जनसंक्या १० लाख से ज्यादा है उन सब से ज्यादा है। सोचने वाली बात डेल्ही में इन सब शहरों से ज्यादा सुरक्षा व्ययवस्था रहती है तब यह हाल है। इसका दोष किसका यह सोचना पड़ेगा।
मुझे किसी कवी/शायर यह पंक्तियाँ याद आ रही हैं....
यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता है
मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है
न बस में ज़िन्दगी इसके न काबू मौत पर इसका
मगर इंसान फिर भी कब खुदा होने से डरता है
अजब ये ज़िन्दगी की क़ैद है, दुनिया का हर इंसान
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है
इस बार जब हम नए साल की खुशियाँ मनाएं और एक दूसरे को बधाई दें तो दिल की किसी कोने में उनको जरूर याद कर लें जो हमारी इस सामाजिक अव्यय्वस्था के कारण इन खुशियों से वंचित हैं.
माया कैलेंडर के अनुसार २१ दिसम्बर २०१२ तो दुनिया का विनाश होना था, शायद वो सही थे, मानव जाती का विनाश तो नहीं हुआ पर मानवता का विनाश हो गया, मानव सभ्यता का विनाश नहीं हुआ पर मानव में सभ्यता का विनाश हो गया। आज यही गिरे हुए सामाजिक व्ययवस्था के कारण यह सब हो रहा है। यह सब हमारी और हमारे द्वारा बनाये गए इस समाज की ही देन है। आज वह लोग कहाँ हैं जो भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर न्यू इयर, वैलेंटाइन्स डे, आदि का विरोध करते रहें हैं, उनको पहले आपने समाज में फैले बिमारी को दूर करना होगा। पच्छिमी देशों में तो ऐसे विभत्स कांड नहीं होते हैं महिलाओं के साथ या होते भी हैं तो यहाँ की तरह हजारों की संख्या में नहीं होते हैं। आंकड़ों पे नज़र डालें तो तो अकेले डेल्ही में है २०११ में ५७२ केस दर्ज हुए थे और २०१२ में अभी तक ६५० से ज्यादा केस दर्ज हो चुके हैं। जो की बाकि सभी बड़े शहर जिनकी जनसंक्या १० लाख से ज्यादा है उन सब से ज्यादा है। सोचने वाली बात डेल्ही में इन सब शहरों से ज्यादा सुरक्षा व्ययवस्था रहती है तब यह हाल है। इसका दोष किसका यह सोचना पड़ेगा।
मुझे किसी कवी/शायर यह पंक्तियाँ याद आ रही हैं....
यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता है
मेरे दिल के किसी कोने में एक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है
न बस में ज़िन्दगी इसके न काबू मौत पर इसका
मगर इंसान फिर भी कब खुदा होने से डरता है
अजब ये ज़िन्दगी की क़ैद है, दुनिया का हर इंसान
रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है
इस बार जब हम नए साल की खुशियाँ मनाएं और एक दूसरे को बधाई दें तो दिल की किसी कोने में उनको जरूर याद कर लें जो हमारी इस सामाजिक अव्यय्वस्था के कारण इन खुशियों से वंचित हैं.
When the politicians will fear for loss of vote..only then some real change will take place..
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